डॉ. गोबिंद सागर भारद्वाज, आईएफएस
डॉ. गोबिंद सागर भारद्वाज ने वर्ष 1994 में भारतीय वन सेवा (आईएफएस) में प्रवेश किया। उन्होंने राजस्थान विश्वविद्यालय से “सीतामाता वन्यजीव अभयारण्य में पक्षी जीवों द्वारा पादप संसाधनों का उपयोग” विषय पर पीएच.डी. की है। प्राकृतिक संसाधन प्रबंधक के रूप में उन्होंने राजस्थान के विभिन्न वन प्रभागों में विभिन्न पदों पर कार्य किया, जिनमें देश के कुछ श्रेष्ठ बाघ अभयारण्यों—रणथंभौर और सरिस्का बाघ अभयारण्य—का प्रबंधन भी शामिल है। रणथंभौर बाघ अभयारण्य में अपने कार्यकाल के दौरान उनमें वन्यजीवों, विशेषकर भव्य बाघ के प्रति गहरी रुचि विकसित हुई। बाघ पर अपने अवलोकनों के आधार पर उन्होंने “ट्रैकिंग टाइगर्स इन रणथंभौर” नामक पुस्तक का लेखन किया। इसके पश्चात उन्होंने सरिस्का बाघ अभयारण्य में फील्ड डायरेक्टर के रूप में भी सेवाएँ दीं।मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव), जोधपुर के रूप में उन्होंने थार परिदृश्य में चल रहे महत्वाकांक्षी ‘प्रोजेक्ट ग्रेट इंडियन बस्टर्ड’ के अंतर्गत अति संकटग्रस्त ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के संरक्षण हेतु विभिन्न इन-सीटू संरक्षण प्रयासों का पर्यवेक्षण किया, साथ ही थार मरुस्थल के वन्य क्षेत्र का प्रबंधन भी किया। उन्होंने जैविक उद्यानों के प्रबंधन एवं विकास तथा चिड़ियाघरों के प्रबंधन का भी पर्यवेक्षण किया।
वे आईयूसीएन एसएससी बस्टर्ड स्पेशलिस्ट ग्रुप केकमीशन सदस्य हैं। थार परिदृश्य के प्रबंधन के अपने अनुभव के आधार पर उन्होंने “डेज़र्ट नेशनल पार्क: ए ज्वेल इन द वाइब्रेंट थार” नामक कॉफी टेबल बुक का भी लेखन किया। भारतीय वन्यजीव संस्थान में वैज्ञानिक के रूप में अपने कार्यकाल (2008–2012) के दौरान उन्होंने लेसर फ्लोरिकन (एक बस्टर्ड प्रजाति) का उसके वितरण क्षेत्र में व्यापक सर्वेक्षण किया तथा ट्रांस-हिमालयी क्षेत्र में पक्षी जीवों का सर्वे भी किया।
उन्हें वर्ष 1999 में राजस्थान राज्य के लिए उत्कृष्ट सेवाओं हेतु राज्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह पुरस्कार उस साहसिक कार्य के लिए प्रदान किया गया, जिसमें उन्होंने गाँव में भटककर आ गए एक बाघ और ग्रामीणों की जान बचाई; इस दौरान वे स्वयं बाघ के हमले में गंभीर रूप से घायल हो गए थे। एक उत्साही यात्री और लेखक होने के साथ-साथ डॉ. भारद्वाज एक प्रख्यात वन्यजीव फोटोग्राफर भी हैं। उनके चित्र अनेक प्रतिष्ठित पत्रिकाओं और जर्नलों में प्रकाशित हुए हैं। उन्हें वर्ष 2011 में सैंक्चुअरी एशिया द्वारा ‘बेस्ट वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर ऑफ द ईयर’ (द्वितीय पुरस्कार) से भी सम्मानित किया गया।
उन्हें वर्ष 2017 में देहरादून स्थित एफआरआई द्वारा भारत की सबसे पुरानी वानिकी पत्रिका ‘इंडियन फॉरेस्टर’ में वन्यजीव पर सर्वश्रेष्ठ लेख के लिए चतुर्वेदी पुरस्कार भी प्रदान किया गया। वर्ष 2019 से 2022 तक उन्होंने अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक तथा नोडल अधिकारी (एफसीए), जयपुर के रूप में सेवाएँ दीं। इस अवधि में उन्होंने राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव के रूप में भी कार्य किया। इसके अतिरिक्त, उन्होंने परियोजना टाइगर के अतिरिक्त महानिदेशक वन, एनटीसीए के सदस्य सचिव तथा पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, नई दिल्ली के अंतर्गत सीआईटीईएस-भारत के प्रबंधन प्राधिकारी के रूप में भी सेवाएँ दी हैं।