भारतीय वन्यजीव संस्थान, वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में अनुसंधान और प्रशिक्षण हेतु एक नोडल राष्ट्रीय एजेंसी है। क्षमता निर्माण आयोग द्वारा सभी राष्ट्रीय सिविल सेवा प्रशिक्षण संस्थानों के मध्य इस संस्थान को 'फोर-स्टार' (चार-सितारा) शीर्ष वरीयता प्राप्त मान्यता प्रदान की गई है।
अधिदेश
"हम राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर वन्यजीव संरक्षण हेतु एक 'उत्कृष्टता केंद्र' के रूप में मान्यता प्राप्त करने के लिए निरंतर प्रयत्नशील हैं।


धेय्य
हमारी सांस्कृतिक और सामाजिक-आर्थिक परिवेश के अनुरूप वन्यजीव विज्ञान के विकास को पोषित करना तथा संरक्षण के क्षेत्र में इसके अनुप्रयोग को बढ़ावा देना।
उद्देश्य एवं लक्ष्य
- वन्यजीव संसाधनों पर वैज्ञानिक ज्ञान का विकास करना।
- वन्यजीव संरक्षण एवं प्रबंधन के लिए विभिन्न स्तरों पर कर्मियों को प्रशिक्षण प्रदान करना।
- प्रबंधन से संबंधित अनुसंधान करना तथा भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप तकनीकों का विकास करना।
- विशिष्ट वन्यजीव प्रबंधन समस्याओं पर जानकारी एवं परामर्श प्रदान करना।
- वन्यजीव अनुसंधान, प्रबंधन एवं प्रशिक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ सहयोग करना।
- वन्यजीव एवं प्राकृतिक संसाधन संरक्षण के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय महत्व के क्षेत्रीय केंद्र के रूप में विकसित होना।

स्थापना एवं परिचय
भारतीय वन्यजीव संस्थान एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित संस्थान है, जिसकी स्थापना वर्ष 1982 में की गई थी। यह संस्थान वन्यजीव अनुसंधान एवं प्रबंधन के विशिष्ट क्षेत्रों में प्रशिक्षण कार्यक्रमों, शैक्षणिक पाठ्यक्रमों तथा परामर्श सेवाओं के संचालन हेतु समर्पित है। जैव-विविधता से संबंधित विविध विषयों और चुनौतियों पर संस्थान देश भर में सक्रिय रूप से उच्च-स्तरीय अनुसंधान कार्यों में संलग्न है।
संस्थान का रमणीय परिसर, जिसे अत्याधुनिक बुनियादी ढांचे के साथ विकसित किया गया है, विद्वतापूर्ण कार्यों को प्रोत्साहित करता है। संस्थान की अनुसंधान परियोजनाएं, जो देश के कोने-कोने में क्षेत्रीय स्थलों पर संचालित की जा रही हैं, संरक्षण में सहायता हेतु वैज्ञानिक सूचनाओं के प्राथमिक स्रोत हैं। ये परियोजनाएं संस्थान के संकाय सदस्यों को वर्तमान क्षेत्रीय स्थितियों और नवीनतम तकनीक से अवगत रखने का माध्यम भी हैं।
पृष्ठभूमि
विगत आधी सदी में भारत की समृद्ध जैव विविधता में काफी कमी आई है। मानव एवं पशुधन की तेजी से बढ़ती आबादी तथा असंतुलित विकास पैटर्न के कारण देश के समृद्ध वन्य क्षेत्र हाशिए पर चले गए हैं या उनका अनुचित दोहन हुआ है। परिणामस्वरूप, जिन प्रजातियों की विविधता और आवास प्रकारों की समृद्धि पर देश को गर्व था, वे आज काफी हद तक क्षीण और विखंडित हो चुके हैं। अब यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न बन गया है कि इस गिरावट को कैसे रोका जाए और इसे पुनः कैसे सुधारा जाए।
यह आत्ममंथन की भावना वास्तव में एक उत्साहजनक संकेत है। इसके साथ ही कुछ अन्य सकारात्मक संकेत भी देखने को मिलते हैं। उदाहरण के लिए, देश के वन विभाग, जो वनों के संरक्षक हैं; अब अपनी भूमिका को केवल औद्योगिक कच्चे माल तक सीमित नहीं देखते, बल्कि मानवता के दीर्घकालिक एवं सतत कल्याण के लिए पारिस्थितिकी तंत्र के एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में समझते हैं। ऐसी समझ दीर्घकाल में प्रारंभिक संरक्षण उपायों की कमियों और असफलताओं को दूर करने में सहायक होगी। वन क्षेत्रों का संरक्षण अभी भी देश की जैव विविधता को सुरक्षित रखने के सबसे प्रभावी उपायों में से एक है।
ऐसी परिस्थितियों में, पुनर्स्थापन के प्रयासों को सुदृढ़ करने के लिए एक संस्था की आवश्यकता महसूस की गई। यह आवश्यक था कि एक ऐसी एजेंसी हो, जो वनों को समग्र दृष्टिकोण से देखते हुए उनके प्रबंधन को जैव विविधता संरक्षण तथा आसपास के लोगों के हितों की रक्षा के साथ जोड़े, और यह सब व्यावहारिक तथा वैज्ञानिक आधार पर किया जाए। इसी विचार के परिणामस्वरूप 1982 में देहरादून में भारतीय वन्यजीव संस्थान की स्थापना की गई, जिसका उद्देश्य सरकारी एवं गैर-सरकारी कर्मियों को प्रशिक्षण देना, अनुसंधान करना तथा वन्यजीव संसाधनों के संरक्षण एवं प्रबंधन से संबंधित विषयों पर परामर्श प्रदान करना था।
भारतीय वन्यजीव संस्थान के लिए यह एक चुनौतीपूर्ण कार्य था, विशेषकर उस समय जब वन प्रबंधन की शिक्षा में वन्यजीव विषय का अभाव था और स्वयं वन्यजीव विज्ञान विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रम में एक महत्वपूर्ण विषय के रूप में स्थापित नहीं हुआ था। किसी पूर्व उदाहरण के अभाव में, भारतीय वन्यजीव संस्थान को लगभग अकेले ही न केवल वन शिक्षा में वन्यजीव दृष्टिकोण को शामिल करना पड़ा, बल्कि अपने कार्यों के निर्वहन हेतु आवश्यक संसाधनों का सृजन एवं विकास भी करना पड़ा।
यह प्रतीत होने वाली कमी अंततः संस्थान की ताकत बन गई, क्योंकि इसके दृष्टिकोण की नवीनता ने इसे मजबूत आधार प्रदान किया और इसके कार्यक्रमों को केवल शैक्षणिक अभ्यास बनने से रोका। भारतीय वन्यजीव संस्थान, आर्थिक तथा मानवीय पहलुओं के समेकन का प्रयास करता हैं। परिणामस्वरूप, आज वन्यजीव संरक्षण का अर्थ केवल कुछ विशिष्ट प्रजातियों की सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक समग्र दृष्टिकोण अपनाता है, जिसमें आसपास रहने वाले मानव समुदायों के हितों को भी शामिल किया जाता है।
भारतीय वन्यजीव संस्थान के अनुसंधान परियोजना, जो देश के विभिन्न क्षेत्रों में संचालित हो रहे हैं, संरक्षण में सहायक वैज्ञानिक जानकारी के प्रमुख स्रोत हैं। साथ ही, ये परियोजनाएं संस्थान के संकाय सदस्यों को वर्तमान क्षेत्रीय परिस्थितियों तथा नवीनतम तकनीकों से अद्यतन बनाए रखने का माध्यम भी हैं।
अपने प्रयासों में भारतीय वन्यजीव संस्थान को संस्थागत विकास, उन्नयन, आधुनिक तकनीकों के समावेशन तथा वैज्ञानिक अवसंरचना के निर्माण हेतु अंतरराष्ट्रीय एवं द्विपक्षीय सहयोग का लाभ प्राप्त हुआ है। ये सहयोग राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वन्यजीव संगठनों, वैज्ञानिक संस्थानों तथा विश्वविद्यालयों के साथ स्थापित किए गए हैं।
अप्रैल 1986 में भारतीय वन्यजीव संस्थान को स्वायत्तता प्रदान की गई, जिससे इसके विकास की गति और तेज हुई। दक्षिण एवं दक्षिण-पूर्व एशिया के अनेक देशों द्वारा नियमित रूप से अपने कर्मियों को इसके प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भेजे जाने के कारण, भारतीय वन्यजीव संस्थान को वन्यजीव प्रबंधन एवं संरक्षण के प्रशिक्षण और शिक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय केंद्र के रूप में मान्यता प्राप्त हो चुकी है।