भारतीय वन्यजीव संस्थान(भा.व.सं.)की शोध परियोजनाएँ बहुविषयक प्रकृति की हैं तथा भारत के विभिन्न जैव-भौगोलिक क्षेत्रों में फैली हुई हैं। इनमें हिमालय, पश्चिमी घाट, तराई, दक्कन का पठार, उत्तर-पूर्व भारत तथा तटीय पारितंत्र शामिल हैं। इन परियोजनाओं को व्यापक रूप से निम्नलिखित विषयों के अंतर्गत वर्गीकृत किया गया है—प्रजातियों की पारिस्थितिकी एवं पुनर्प्राप्ति, परिदृश्य एवं आवास संरक्षण, मानव–वन्यजीव अंतःक्रियाएँ, पारितंत्र सेवाएँ, जलवायु परिवर्तन तथा संरक्षण आनुवंशिकी।

भारतीय वन्यजीव संस्थानकी कुछ प्रमुख तथा दीर्घकालिक शोध परियोजनाओं में शामिल हैं:

प्रजाति पुनर्प्राप्ति एवं पारिस्थितिकी


भारतीय वन्यजीव संस्थान(भा.व.सं.)ने बाघ, हाथी, हिम तेंदुआ, एशियाई शेर, गैंडा, हंगुल, ढोल (जंगली कुत्ता), लाल पांडा तथा गिद्ध जैसी संकटग्रस्त एवं प्रमुख प्रजातियों पर व्यापक शोध कार्य किया है। अखिल भारतीय बाघ आकलन, भारत में हिम तेंदुआ जनसंख्या आकलन तथापन्ना और सरिस्का में पुनःस्थापित बाघों की निगरानीजैसी परियोजनाएँ नीति निर्माण और संरक्षण योजना पर अपने महत्वपूर्ण प्रभाव के लिए विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

परिदृश्य एवं आवास संरक्षण


इस विषय के अंतर्गत आने वाली परियोजनाएँ परिदृश्य-स्तरीय संरक्षण दृष्टिकोण, संरक्षित क्षेत्रों के बीच संपर्क, आवास विखंडन तथा आवास पुनर्स्थापन पर केंद्रित हैं।इसके उदाहरणों मेंतराई आर्क परिदृश्य परियोजना, पश्चिमी घाट जैव विविधता आकलन, मध्य भारत में वन्यजीव गलियारे, तथाऊपरी ब्रह्मपुत्र घाटी आर्द्रभूमि संरक्षणशामिल हैं।इन परियोजनाओं में प्रायः भू-स्थानिक विश्लेषण, दूरसंवेदी तकनीकों तथा सहभागी योजना प्रक्रियाओं का उपयोग किया जाताहै

मानव–वन्यजीव संघर्ष एवं सह-अस्तित्व


भारतीय वन्यजीव संस्थान(भा.व.सं.)ने मानव–वन्यजीव संघर्ष के प्रलेखन तथा उसके न्यूनीकरण हेतु सक्रिय रूप से कार्य किया है। इसके अंतर्गत बाघ, तेंदुआ, हाथी जैसे बड़े मांसाहारी प्राणियों, नीलगाय एवं जंगली सूअर जैसे शाकाहारी जीवों तथा अन्य प्रजातियों के साथ होने वाले संघर्ष के स्वरूपों का आकलन करने वाली परियोजनाएँ संचालित की गई हैं।संस्थान द्वारा संघर्ष मानचित्रण, प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों तथा समुदाय-आधारित संघर्ष समाधान रणनीतियों के लिए मानक प्रोटोकॉल भी विकसित किए गए हैं।

जलवायु परिवर्तन एवं अनुकूलन


भारतीय वन्यजीव संस्थान(भा.व.सं.)ऐसी परियोजनाओं में संलग्न है जिनके माध्यम से जलवायु परिवर्तन के प्रभावों—जैसे प्रजातियों के वितरण, ऋतुचक्र तथा पारितंत्र की सहनशीलताका आकलन किया जाता है।इन अध्ययनों में भविष्य के जलवायु परिदृश्यों के अंतर्गत प्रजातियों के संभावित आवास क्षेत्र में होने वाले परिवर्तनों का मॉडलिंग करना तथा जलवायु शरणस्थलों की पहचान करना शामिल है।ट्रांस-हिमालय, उच्च ऊँचाई वाली आर्द्रभूमियाँ तथा तटीय पारितंत्र जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में भी अध्ययन किए गए हैं, जिनका उद्देश्य संवेदनशीलता को समझना तथा अनुकूलन रूपरेखाओं का विकास करना है।

जैव विविधता एवं पारितंत्र सेवाएँ


कई परियोजनाएँ विभिन्न पारितंत्रों में जैव विविधता के आकलन, पारितंत्र सेवाओं के मात्रात्मक मूल्यांकन तथा संरक्षण को आजीविका के साथ एकीकृत करने पर केंद्रित हैं। इनमें पवित्र उपवनों, सामुदायिक आरक्षित क्षेत्रों और कृषि–वानिकी प्रणालियों की जैव विविधता का अध्ययन शामिल है। इसके साथ ही भारतीय वन्यजीव संस्थान(भा.व.सं.)प्राकृतिक पूंजी लेखांकन तथा पारिस्थितिक मूल्यांकन से संबंधित अध्ययन भी संचालित करता है।.

वन्यजीव फॉरेंसिक एवं आनुवंशिकी


भारतीय वन्यजीव संस्थान(भा.व.सं.)में अत्याधुनिकवन्यजीव फॉरेंसिक एवं संरक्षण आनुवंशिकीसुविधा उपलब्ध है। यहाँ डीएनए आधारित प्रजाति पहचान, जनसंख्या आनुवंशिकी, वन्यजीव अपराधों की जाँच तथा पुनःस्थापित प्रजातियों की आनुवंशिक निगरानी से संबंधित अनुसंधान किया जाता है। यह प्रयोगशाला प्रवर्तन एजेंसियों को तकनीकी सहयोग प्रदान करती है तथा वन्यजीव अपराधों से जुड़े मामलों में न्यायिक कार्यवाही में भी महत्वपूर्ण योगदान देती है।

पारिस्थितिक निगरानी एवं प्रौद्योगिकी एकीकरण


भारतीय वन्यजीव संस्थान(भा.व.सं.)की परियोजनाओं में अब आधुनिक तकनीकी उपकरणों का व्यापक रूप से समावेश किया जा रहा है। इनमें कैमरा ट्रैप, रेडियो टेलीमेट्री, ड्रोन-आधारित सर्वेक्षण, जीआईएस एवं रिमोट सेंसिंग तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी तकनीकों का उपयोग वन्यजीव आबादी, आवास परिवर्तनों और पारिस्थितिक प्रक्रियाओं की निगरानी हेतु किया जाता है।एकीकृत बाघ आवास संरक्षण कार्यक्रमतथास्मार्ट पेट्रोल प्रोटोकॉलजैसी परियोजनाएँ इस समेकित दृष्टिकोण के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

संरक्षण शिक्षा एवं सामुदायिक सहभागिता


कई शोध परियोजनाओं में पर्यावरणीय शिक्षा, हितधारकों के प्रशिक्षण तथा सहभागी संरक्षण के घटक शामिल हैं। समुदाय-आधारित संरक्षण मॉडलों का भारत के विभिन्न क्षेत्रों—जैसे लद्दाख, मिज़ोरम, अरुणाचल प्रदेश और सुंदरबन—में प्रायोगिक रूप से कार्यान्वयन किया गया है, जिनमें स्थानीय शासन व्यवस्था, इको-डेवलपमेंट तथा पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों की सक्रिय भागीदारी रही है।

नीति समर्थन एवं राष्ट्रीय कार्य योजनाएँ


भारतीय वन्यजीव संस्थान(भा.व.सं.)नेराष्ट्रीय वन्यजीव कार्य योजना, राष्ट्रीय जैव विविधता लक्ष्य, गिद्धों एवं अन्य प्रजातियों के संरक्षण हेतु कार्य योजनाएँ, तथारेखीय अवसंरचना के लिए शमन दिशानिर्देशजैसी अनेक राष्ट्रीय रणनीतियों के निर्माण में महत्वपूर्ण शोधात्मक योगदान प्रदान किया है।

संक्षेप में, भारतीय वन्यजीव संस्थान का शोध पोर्टफोलियो व्यापक, गतिशील तथा राष्ट्रीय संरक्षण प्राथमिकताओं और वैश्विक जैव विविधता लक्ष्यों—दोनों के अनुरूप है। इसकी परियोजनाएँ वैज्ञानिक, शासकीय एवं नागरिक समाज के विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग को प्रोत्साहित करते हुए, सुविचारित एवं प्रभावी संरक्षण कार्यवाही के लिए एक सुदृढ़ आधार प्रदान करती हैं।