राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन

गंगा नदी एशिया की सबसे बड़ी नदियों में से एक है, जो उत्तराखंड के गोमुख से लेकर पश्चिम बंगाल में गंगासागर स्थित बंगाल की खाड़ी तक लगभग 2,500 किलोमीटर से अधिक की दूरी तय करती है और भारत के लगभग 26% भू-भाग को आच्छादित करती है। यह एक अंतर-सीमाई (ट्रांस-बाउंड्री) नदी है, जो भारत और बांग्लादेश में फैले विश्व के सबसे बड़े डेल्टा—सुंदरबन—का निर्माण करती है। टेथिस सागर के पूर्वी किनारे के अवशेषों के रूप में, गंगा बेसिन अनेक अवशेष, दुर्लभ एवं संकटग्रस्त प्रजातियों का आवास है।

इनमेंगंगीय डॉल्फ़िन (प्लैटैनिस्टा गैंगेटिका), ऊदबिलाव की तीन प्रजातियाँ—स्मूद-कोटेड ऊदबिलाव (लुट्रोगेल पर्सपिसिलाटा), यूरेशियन ऊदबिलाव (ल्यूट्रा ल्यूट्रा)तथा छोटे-नाख़ून वाली ऊदबिलाव (एओनिक्स सिनेरेउस)—शामिल हैं। इसके अतिरिक्तअत्यंत संकटग्रस्त घड़ियाल (गैवियलिस गैंगेटिकस), मगर अथवा भारतीय दलदली मगरमच्छ (क्रोकोडायलस पालस्ट्रिस), खारे पानी का मगरमच्छ (क्रोकोडायलस पोरोसस)तथा कम से कममीठे पानी के कछुओं की 12 प्रजातियाँ, जिनमेंअत्यंत संकटग्रस्त बाटागुर कचुगा (बाटागुर कचुगा)भी शामिल है, पाई जाती हैं। गंगा नदी प्रणाली के अंतर्गत 11 गणों , 32 कुलों और 72 वंशोंसे संबंधितमीठे पानी की 143 विभिन्न मछली प्रजातियाँदर्ज की गई हैं। इनमें अत्यंत संकटग्रस्त गंगा शार्क (ग्लाइफिस गैंगेटिकस), गंगीय स्टिंगरे (हिमैन्टुरा फ्लुवियाटिलिस), गोल्डन महसीर (टोर प्यूटिटोरा)तथा हिल्सा (टेनुआलोसा इलिशा)शामिल हैं।

11 राज्यों में फैला गंगा बेसिन लगभग 10 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में विस्तृत है। यह विश्व के सर्वाधिक घनी आबादी वाले नदी बेसिनों में से एक है, जहाँ 100 से अधिक श्रेणी–I एवं श्रेणी–II शहर और कस्बे तथा हजारों गाँव स्थित हैं। विकास की लगातार बढ़ती माँग के कारण पूरे बेसिन में जल की कमी और जल गुणवत्ता में गिरावट आई है। इन बस्तियों से निकलने वाला लगभग सारा घरेलू सीवेज, जो प्रायः बिना उपचार के होता है, सीधे बेसिन की जलधाराओं में प्रवाहित हो जाता है।घरेलू और औद्योगिक प्रदूषकों के अतिरिक्त, प्रतिदिन सैकड़ों मानव शव और हजारों पशु शव आध्यात्मिक अनुष्ठानों के तहत नदी में प्रवाहित किए जाते हैं। जनसंख्या का बढ़ता दबाव, जल गुणवत्ता से संबंधित अवसंरचना में निवेश की कमी तथा लोगों के सशक्तिकरण का अभाव—ये सभी कारक मिलकर गंगा की बिगड़ती स्थिति में लगातार योगदान दे रहे हैं।

गंगा बेसिन का जलीय वन्यजीवन—जिसमें गंगा नदी की मुख्य धारा भी शामिल है—जल स्तर में कमी, प्रदूषण तथा नदी संसाधनों के अत्यधिक दोहन के कारण गंभीर संकट में है, जिससे आवासों का क्षरण हो रहा है। बढ़ती मानव जनसंख्या, औद्योगिक विकास, वनों की कटाई, विभिन्न अवरोधों के कारण नदी प्रणालियों का विखंडन, तथा जल के मोड़ (डाइवर्ज़न) और अनियंत्रित दोहन के कारण जल की कमी और प्रवाह में कमी—इन सभी ने जलीय प्रजातियों पर गंभीर नकारात्मक प्रभाव डाला है।विशेष रूप से मछलियों पर इसका अधिक असर पड़ा है, जहाँ कई प्रजातियों की आबादी में लगातार गिरावट देखी जा रही है। इनमें व्यावसायिक रूप से उपयोग की जाने वालीहिल्सा, गोल्डन महसीर, तथा अन्य कैटफ़िश और मिनोज़ शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, पूर्णतः जलीय जीवन पर निर्भर प्रजातियाँ—जैसेजलपक्षीऔरद्वीपों पर घोंसला बनाने वाले पक्षी—भी नदी प्रणाली में हो रहे परिवर्तनों के कारण अत्यधिक प्रभावित हो रही हैं।

गंगा नदी के पुनर्स्थापन के लिए किए गए प्रारंभिक प्रयास मुख्यतः इंजीनियरिंग-आधारित उपायोंपर केंद्रित थे, जिनका उद्देश्य जल गुणवत्ता को बनाए रखना था, किंतु इन प्रयासों में पुनर्स्थापन प्रक्रिया मेंस्थानीय समुदायों की भागीदारीपर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। परिणामस्वरूप, गंगा नदी के पुनर्स्थापन में अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं हो सकी।गंगा से संबंधित मुद्दों कोबेसिन स्तरपर संबोधित करने, उसकीजल गुणवत्ता, पारिस्थितिक प्रवाह , जैव विविधता मूल्यतथानिरंतर पारितंत्र सेवाओंको बनाए रखने के उद्देश्य से भारत सरकार ने राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरणकी स्थापना की।राष्ट्रीय स्वच्छ गंगामिशन,(एनएसएमजी ) राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरणकी कार्यान्वयन इकाई है | यह एक पंजीकृत सोसायटी है जिसका गठन मूल रूप से पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा 12 अगस्त 2011 को सोसायटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 के अंतर्गत किया गया था।

भारत सरकार (कार्य आवंटन) नियम, 1961 में किए गए 306 वें संशोधन के अनुसार, एनजीआरबीए और एनएमसीजी —दोनों कोजल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय को आवंटित किया गया। भारत सरकार के सचिव, वर्तमान मेंएनएमसीजी की गवर्निंग काउंसिलके अध्यक्ष हैं। राष्ट्रीय स्तर पर, एनएमसीजी समन्वयक निकाय के रूप में कार्य करता है, जिसेराज्य स्तरीय कार्यक्रम प्रबंधन समूहों का समर्थन प्राप्त है। ये समूह उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल मेंसोसाइटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 के अंतर्गत पंजीकृत सोसायटियों के रूप में स्थापित हैं, तथा झारखंड में एक समर्पितनोडल सेलभी कार्यरत है।

एनएमसीजी का कार्यक्षेत्रगंगा नदी बेसिनहोगा, जिसमें वे सभी राज्य शामिल होंगे जिनसे होकर गंगा प्रवाहित होती है, साथ हीराष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्लीभी इसमें सम्मिलित है। भविष्य में, प्रदूषण के प्रभावी नियंत्रण और गंगा के संरक्षण के उद्देश्य से, गवर्निंग काउंसिल द्वारा एनएमसीजी के कार्यक्षेत्र का विस्तार, परिवर्तन या संशोधन उन अन्य राज्यों तक भी किया जा सकता है, जिनसे होकर गंगा की प्रमुख सहायक नदियाँ प्रवाहित होती हैं, जैसा कि एनजीआरबीए द्वारा निर्धारित किया जाए।

एनएमसीजी की शुरुआत गंगा से जुड़ी चुनौतियों का समाधान करने के लिए एकसमग्र दृष्टिकोणके साथ की गई है, जो चार प्रमुख क्षेत्रों पर केंद्रित है—

  • अपशिष्ट जल प्रबंधन,
  • ठोस अपशिष्ट प्रबंधन,
  • औद्योगिक प्रदूषण, तथा
  • नदी तट (रिवर फ्रंट) विकास।

एनएमसीजी ने गंगा नदी केजैव-विविधता मूल्यको पुनर्स्थापित करने हेतु एक व्यापक रणनीति विकसित की है, जिसका अंतिम लक्ष्य गंगा नदी संरक्षण के लिए एनएमसीजी की दीर्घकालिक दृष्टि को साकार करना है, ताकि सभी स्थानिक (एंडेमिक) और संकटग्रस्त जलीय प्रजातियों कीव्यवहार्य आबादीअपने पूर्ण ऐतिहासिक विस्तार क्षेत्र में स्थापित हो सके और गंगा नदी पारिस्थितिकी तंत्र की अखंडता बनाए रखने में अपनी भूमिका निभा सके।

इसका तात्कालिक लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि 2020 तक गंगा नदी की प्रजातीय विविधता के लिए मौजूद खतरों में—चाहे वे वर्तमान में संकटग्रस्त हों या निकट भविष्य में संकटग्रस्त होने की संभावना हो—एक महत्वपूर्ण कमी लाई जा सके।