भारतीय वन्यजीव संस्थान ने गुरुवार, 05 जनवरी 2023 को देहरादून में हस्तशिल्प निर्यात संवर्धन परिषद के साथ एक समझौता ज्ञापनपर हस्ताक्षर किए, जिसके अंतर्गतभारतीय वन्यजीव संस्थान परिसर में एक “पश्मीना प्रमाणन केंद्र” की स्थापना की गई। यह सुविधा सार्वजनिक–निजी भागीदारी मॉडल पर आधारित है, जिसका उद्देश्य पश्मीना व्यापारियों को प्रमाणित एवं असली उत्पादों की बिक्री हेतु प्रामाणिकता प्रमाणपत्र प्राप्त करने में सहायता प्रदान करना है।
अब सभी परीक्षण किए गए पश्मीना उत्पादों पर एकअनुसरणीय विशिष्ट यूनिक आईडी टैगतथा व्यक्तिगत प्रमाणपत्र लगाए जाते हैं, जिससे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में इन उत्पादों का निर्बाध व्यापार संभव हो सके।
पश्मीना प्रमाणन केंद्र का उद्घाटन 19 मई 2023 को श्री भूपेंद्र यादव माननीय केंद्रीय पर्यावरण,
वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री, भारत सरकार द्वारा किया गया।
पृष्ठभूमि
ऊन रेशा का उपयोग मानव द्वारा लंबे समय से वस्त्र एवं अन्य कपड़ा सामग्री के निर्माण में ऊष्मा, फैशन/लक्ज़री आदि उद्देश्यों के लिए किया जाता रहा है। सामान्यतः उपलब्ध ऊन विभिन्न नस्लों की भेड़ों से प्राप्त होती है, किंतु इसके अतिरिक्त अन्य प्राकृतिक पशु रेशे—जैसे बकरियों और ऊँट प्रजाति से प्राप्त रेशे—भी वस्त्रों एवं कपड़ा सामग्री में बड़ी मात्रा में प्रयुक्त होते हैं, कभी अकेले तो कभी अन्य ऊन के साथ मिश्रित रूप में।
पश्मीना अथवा कश्मीरी ऊन एशियाई पर्वतीय बकरियों की विभिन्न नस्लों की शीतकालीन महीन ऊन है (मिल्लर , 1986), जिसे वस्त्र उद्योग में ज्ञात सबसे उत्कृष्ट और कोमल पशु रेशों में से एक माना जाता है (Watkins and Buxton, 1992; Frank, 2001; McGregor, 2001; Ross, 2005)। पर्वतीय बकरियों से प्राप्त यह पशु रेशा परिधान निर्माण के लिए विशेष माना जाता है और इसकी असाधारण सुंदरता, कोमल बनावट, मजबूती, चमक तथा परिधानों में प्रयुक्त कारीगरी के कारण इसकी अत्यधिक मांग रहती है।
उन्नत पश्मीना प्रमाणन केंद्र का उद्घाटन
पश्मीना बकरी
पश्मीना बकरियों को सदियों से घुमंतू पशुपालकों द्वारा ट्रांस–हिमालयी क्षेत्र की अत्यंत ठंडी और शुष्क जलवायु में पाला जाता रहा है, ताकि अत्यंत महीन पश्मीना रेशा प्राप्त किया जा सके। आय के एक महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में इसे कश्मीरी (कैशमीयर) के नाम से जाना जाता है
पश्मीना प्रमाणीकरण क्यों ?
पश्मीना/कैशमीयर उत्पादों की निर्माण लागत में वृद्धि के साथ-साथ, निर्माण लागत को कम करने के लिए कैशमीयर वस्त्र बाज़ार पर दबाव बढ़ता जा रहा है। इसके परिणामस्वरूप सस्ते प्राकृतिक रेशों की मिलावट की जा रही है, जिनमें गैर-कैशमीयर रेशों का प्रतिस्थापन, रासायनिक रूप से उपचारित मोटे पशु रेशे (भेड़ की ऊन) तथा कृत्रिम (सिंथेटिक) रेशों का उपयोग शामिल है।, प्रतिबंधित रेशों को पश्मीना/कैशमीयर के रूप में गलत घोषणा कर अंतरराष्ट्रीय व्यापार के दौरान प्रवर्तन एजेंसियों को गुमराह किया जाता है, जिससे व्यापारियों को वित्तीय नुकसान और कानूनी जाँच-पड़ताल का सामना करना पड़ता है तथा ब्रांड की साख को भी क्षति पहुँचती है।
पश्मीना उत्पाद निर्माताओं, कारीगरों और व्यापारियों को समर्थन देने तथा भारत से निर्बाध निर्यात को बढ़ावा देने के उद्देश्य से, भारतीय वन्यजीव संस्थान विशेष रूप से “पश्मीना उत्पादों” के प्रमाणन हेतु एक सुविधा स्थापित की गई है, जिसे “पश्मीना प्रमाणन केंद्र" कहा जाता है। यह केंद्र भारतीय वन्यजीव संस्थानऔर हस्तशिल्प निर्यात संवर्धन परिषदके बीच हुए समझौता ज्ञापन के अंतर्गत स्थापित किया गया है।
प्रमाणन का उद्देश्य केवल पश्मीना उत्पादों की शुद्धता के लिए गुणवत्तापूर्ण प्रमाणन प्रदान करना ही नहीं है, बल्कि यह भी प्रमाणित करना है कि उत्पाद किसी भीप्रतिबंधित रेशे से मुक्त है, ताकि भारत से पश्मीना उत्पादों की निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित हो सके। यह प्रमाणन खरीदारों को प्रमाणित पश्मीना उत्पाद खरीदने में सहायता करेगा तथा प्रतिबंधित रेशों के उपयोग को हतोत्साहित करेगा, जिसके परिणाम स्वरूप चिरू का उसके प्राकृतिक आवास में संरक्षण सुनिश्चित करने में भी योगदान मिलेगा।